जब रोजगार पर पड़ेगी रोबॉट की मार, तब क्या करेगा भारत? 10/25/2016 7:23:39 AM

-रेशू वर्मा- तकनीक सिर्फ सुविधा नहीं देती, खौफनाक आंकड़े भी देती है। हाल में आई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक मशीनें भारत में 69 प्रतिशत, चीन में 77 और इथियोपिया में 85 प्रतिशत नौकरियों पर खतरा बनकर आएंगी। इस रिपोर्ट के साथ जरा इस खबर पर भी गौर करें। देश के दो बड़े प्राइवेट बैंक एचडीएफसी और आईसीआईसीआई अपने कामकाज में रोबॉट का इस्तेमाल बढ़ाने की बात कर रहे हैं। एक बड़ा अमेरिकी बैंक भारत में अपनी शाखाओं की संख्या में कमी कर रहा है, क्योंकि तकनीक में बेहतरी के चलते ज्यादा शाखाओं और ज्यादा कर्मियों की जरूरत नहीं बची। हाल में क्लॉज शाब और रिचर्ड सैमसंस द्वारा तैयार एक रिपोर्ट के मुताबिक रोबॉट बहुत सी नौकरियां खाने वाले हैं। शॉब, सैमसंस की रिपोर्ट के मुताबिक 2020 तक दुनिया भर में करीब पचास लाख नौकरियां खत्म हो जाएंगी, रोबॉट तकनीक के चलते। इसमें वाइट कॉलर क्लर्की की नौकरियां भी शामिल हैं। अभी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों में से करीब 70 प्रतिशत बच्चे वो काम, वो नौकरियां कर रहे होंगे, जो अभी मौजूद ही नहीं हैं। दरअसल पचास लाख नौकरियों के खात्मे का आंकड़ा कुछ यूं है कि 2020 तक कुल सत्तर लाख नौकरियां जाएंगी, पर 20 लाख ऐसी नौकरियां आएंगी, जो नई गतिविधियों, नए कौशल से जुड़ी होंगी। इस तरह कुल 50 लाख नौकरियां जाएंगी। यह न समझिए कि भारत इस नौकरी, खाऊ प्रक्रिया से अछूता रहने वाला है। तकनीक ने भारत में भी बहुत नौकरियां खाई हैं, इसके बावजूद तकनीकी विकास को रोका नहीं जा सकता। उसके समग्र परिणामों पर विचार करके रणनीतियां जरूर बनाई जा सकती हैं। जैसे, अभी भारत में होने वाले कुल रेल रिजर्वेशन का करीब चालीस प्रतिशत ऑनलाइन होता है। यानी बंदे स्टेशन की खिड़कियों पर खड़े होकर टिकट नहीं खरीदते। इंटरनेट पर मोबाइल के जरिए रिजर्वेशन हो रहे हैं। इसका एक असर यह है कि जो काम रेल, क्लर्क करता, वह काम मोबाइल ऐप्लिकेशन पर या इंटरनेट कैफे में कोई और कर रहा है। वह काम रेल से शिफ्ट होकर बाहर चला गया है। रोबॉट बहुत विकसित तकनीक पर काम करता है। यह छोटे, मोटे नहीं, बहुत जटिल काम भी कर सकता है। सुरक्षा, बैंकिंग से लेकर लेकर शिक्षा तक के कारोबार में यह आ सकता है। बल्कि कई में तो आ भी गया है। अमेरिका में कुछ अस्पतालों में दवा देने का काम रोबॉट कर रहे हैं। ऑपरेशन वगैरा में भी रोबॉट अपनी क्षमताओं के चलते मदद दे रहे हैं। जिन मामलों में इंसानी हाथों की सीमाएं होतीं हैं, वहां रोबॉट मदद करते हैं। उदाहरण के लिए इंसानी कलाई सिर्फ दो दिशाओं में घूम सकती है जबकि रोबॉटिक भुजा आठ दिशाओं में घूम सकती है। हां, यह भूमिका किसी डॉक्टर के निर्देशों के तहत ही निभाई जाती है। अमेरिका में कानून से जुड़े शोध कई मामलों में मशीनें ही निपटा रही हैं। मोटे तौर पर रोबॉट वह काम करते हैं, जिनमें मानवीय निर्णयों और रचनात्मकता की जरूरत नहीं है। जैसे नोट गिनने का काम। मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत किसी प्लांट में तमाम साजो, सामान को कहीं ले जाकर रखने, कल, पुर्जों को फिट करने का काम रोबॉट कर सकता है। पर रोबॉट वह काम नहीं कर सकता, जहां कुछ सोचने की दरकार होगी। तकनीक जिस गति से आगे बढ़ रही है, संभव है कि यह काम भी रोबॉट कर ले। गूगल की ड्राइवर विहीन कार, इसका एक उदाहरण है। भारत में तो अभी ड्राइविंग मानव के बगैर संभव नहीं है, पर क्या पता पांच, सात सालों बाद भारत में भी ऐसी कारें चलने लगें तो ड्राइवरों की नौकरी पर आफत आ सकती है। भारत जैसे देश के लिए चुनौतियां दोहरी हैं। हम तकनीकी विकास में पीछे भी नहीं रहना चाहेंगे पर यह भी नहीं चाहेंगे कि रोजगार कम हों। यह मसला सिर्फ तकनीक का नहीं, आर्थिक और राजनीतिक भी है। कई क्षेत्रों में रोजगार ध्वस्त होंगे। नए आएंगे किन क्षेत्रों में, इसकी पड़ताल अभी से बहुत जरूरी है।ंनजवउंजपब जो क्षेत्र भविष्य में विकसित होने वाले हैं, उनके लिए विद्यार्थियों को अभी से तैयार करना होगा। इस संबंध में भारत का रिकॉर्ड बहुत खराब है। देश के तमाम शैक्षणिक संस्थान वास्तविक उद्योग और रोजगार के मामले में बहुत पीछे चलते हैं। जैसे ऑनलाइन शॉपिंग के जमाने में भी भारत में कॉमर्स और प्रबंधन कोर्सों में ई, कॉमर्स, ई, उपभोक्ता, ई, फाइनैंस जैसे विषयों पर पढ़ाई लगभग न के बराबर है। पत्रकारिता तक में फेसबुक, ट्विटर से जुड़ी जानकारियां दिए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। जब हमारे सामने साफ है कि भविष्य में रोबॉट, तकनीक के चलते तमाम पुराने धंधे चले जाएंगे और नए कौशल की जरूरत पड़ेगी, तब अभी से उन बदलावों को शिक्षा, व्यवस्था में समाहित करके हम भविष्य की बेहतर तैयारी कर सकते हैं। शिक्षा में बदलाव:-भारत अपने विद्यार्थियों को भविष्य की तकनीक के लिए ढंग से तैयार करे तो बेरोजगारी की चुनौतियों का सामना करना आसान रहेगा। विकसित पश्चिमी देशों में बेरोजगारी उस तरह की समस्या नहीं है। वहां खाने, पीने का इंतजाम सबका हो जाता है। सरकारें तमाम तरह के सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम चलाती हैं। पर ऐसी स्थिति भारत में नहीं है। इसलिए रोबॉट से निपटने के लिए हमारी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव बहुत जरूरी है। पर ऐसी कोई तैयारी दिखाई नहीं पड़ रही है। डिजिटल इंडिया के साथ, साथ पांच, दस साल बाद के रोबॉटिक इंडिया के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए। ऐसा हो सका तो हम भविष्य के लिए बेहतर तौर पर तैयार होंगे। (लेखिका तकनीक विषयों की जानकार हैं)